सोमवार, 16 जनवरी 2012

हुल्ले नी माइ हुल्ले दो बेरी पत्ता झुल्ले .. ब्‍लॉग4वार्ता .. संगीता पुरी

ज्योतिष विज्ञान के अनुसार मकर संक्रांति एक भौगोलिक घटना है। इस दिन सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में आते हैं तो इन दिन को मकर संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति को जहां एक किसानी का त्यौहार के रूप में मनाया जाता है वहीं भारतीय संस्कृति में एक शुभ चरण की शुरुआत के रूप में माना जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार मध्य दिसंबर के आसपास अशुभ चरण की समाप्ति पर शुभ् चरण की शुरू होती है। दूसरी ओर संक्रांति सर्दियों के मौसम की समाप्ति और एक नई फसल या बसंत के मौसम की शुरुआत के रूप में भी मनाया जाता है। यह त्यौहार पूरे भारत देश में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। देश के विभिन्न भागों में इसे अलग-अलग नामों और अनुष्ठान के साथ मनाया जाता है।
जिसे कि तिल संक्रांति भी कहा जाता है। यही ऎसा एकमात्र पर्व है जिसे समूचे भारतवर्ष में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों। इसके माध्यम से हमें भारतवर्ष के सांस्कृतिक वैविधय की रंग-बिरंगी छटा देखने को मिलती है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है । इसी कारण यहां रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है, किंतु मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर बढने लगता है। जिससे कि दिन की बजाय रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा यहीं से ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ हो जाता है। अब दिन बड़ा होगा तो निश्चित रूप से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार घटने लगेगा। अत: मकर संक्रांति पर सूर्य के इस राशि परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्यशक्ति में वृद्धि होगी------यही जानकर इस देश के विभिन्न प्रान्तों में विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है।
आमजन को यह मालूम है कि दीपावली, होली सहित कई पर्व की तारीख तय नहीं होती लेकिन मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही मनाई जाती है। इस बार यह पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। ऐसा क्यों? वह इसलिए क्योंकि सूर्य का धनु से मकर राशि में प्रवेश 14 को मध्यरात्रि के बाद होगा। पंडितों की मानें तो सन् 2047 के बाद ज्यादातर 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति आएगी।अधिकमास, क्षय मास के कारण कई बार 15 जनवरी को संक्रांति मनाई जाएगी। इससे पहले सन् 1900 से 1965 के बीच 25 बार मकर संक्रांति 13 जनवरी को मनाई गई। उससे भी पहले यह पर्व कभी 12 को तो कभी 13 जनवरी को मनाया जाता था। पं. लोकेश जागीरदार (खरगोन) के अनुसार स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। उनकी कुंडली में सूर्य मकर राशि में था यानी उस समय 12 जनवरी को मकर संक्रांति थी। 20वीं सदी में संक्रांति 13-14 को, वर्तमान में 14 तो कभी 15 को मकर संक्रांति आती है। 21वीं सदी समाप्त होते-होते मकर संक्रांति 15-16 जनवरी को मनाने लगेंगे ।
सूर्य मकर राशि मे प्रवेश करेगा (भारतीय समयानुसार) अतः अगले दिन प्रातः काल अर्थात 15 जनवरी 2012 रविवार के दिन ही 'मकर संक्रांति ' पर्व मनाना चाहिए। किन्तु कुछ लकीर के फकीर आपको 14 जनवरी,शनिवार (जबकि सूर्य 'धनु राशि ' मे ही होगा) को भी इस पर्व को मनाते दीख जाएँगे।
वर्ष २०१२ में सूर्य मकर राशि में (भारतीय समय के अनुसार) दिल्ली के अक्षांश/देशांतर के अनुसार १५ जनवरी २०१२ को प्रातः ०४ बजकर ०९ मिनट १४ सेकंड में प्रवेश करेंगे, अतः वर्ष २०१२ में मकर संक्रांति १५ जनवरी को मनाई जायेगी ।
१५ जनवरी २०१२, विक्रम संवत २०६८ की सूर्योदयी तिथि माघ कृष्ण पक्ष सप्तमी है ।
१५ जनवरी को मकर संक्रांति सर्वाथसिद्धि, अमृत सिद्धि, रवि योग, भानु सप्तमी एवं रविवार (पांच महायोग) के साथ आ रहा है ।
त्योहारों की बात हो और मिठाई न हो ऐसा तो हो नहीं सकता।
हर त्योहार पर विशेष पकवान बनाने व खाने की परंपराएं भी हमारे यहां प्रचलित हैं।
मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष रूप से तिल व गुड़ के पकवान बनाने व खाने की परंपरा है।
सर्दी भी अपनी वृद्धावस्था में चली जायेगी...चली जायेगी...धीमी चाल से...पर चली ही जायेगी अब तो!सूर्य देवता जो अब तक धुंध और मेघो से संघर्ष में स्वयं को यदा-कदा लाचार अनुभव कर रहे थे....अब पुनः अपना तेज प्राप्त करते चले जायेगे.... न मेघो की चलेगी न धुन्ध अब इतना इतर पाएगी....जो चाहेंगे तो बरस जायेंगे मेघ पर....सूर्य देवता से आंखमिचोली...अब अधिक न चल पाएगी...!अर्थात ठण्ड घटती चली जायेगी.....और...
यह पर्व आसुरी [नकारात्मक] विचारों को छोडकर दैवी [सकारात्मक] विचारों को अपनाने का है। डॉ. अतुल टण्डन का आलेख..
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर-संक्रांति कहलाता है। संक्रांति के लगते ही सूर्य उत्तरायण हो जाता है। मान्यता है कि मकर-संक्रांति से सूर्य के उत्तरायण होने पर देवताओं का सूर्योदय होता है और दैत्यों का सूर्यास्त होने पर उनकी रात्रि प्रारंभ हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि यह पर्व देवताओं [सकारात्मकता] का नव-प्रभात और दैत्यों [नकारात्मकता] की संध्या है। धर्मग्रंथों में मकर से मिथुन राशि तक सूर्य की स्थिति को उत्तरायण यानी देवताओं का दिन कहा गया है, इससे तात्पर्य है दैवी चेतना [सद्गुणों] की जागृति और संभवत:यही उत्तरायण के माहात्म्य का कारण है। महाभारत में उल्लेख है कि शर-शय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी।
जो हमारे देश के हर प्रान्त में किसी न किसी रूप में मनाया ही जाता है. पौष मास में जब सूर्य धनु राशि को छोडकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, अर्थात इस दिन से सूर्य की उत्तरायण की गति प्रारंभ हो जाती है. यह त्यौहार भारत के अलग -अलग हिस्सों में विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है.


पंजाब और हरियाणा में यह लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है तो उत्तर-प्रदेश में इस त्यौहार में दान की प्रमुखता है जबकि इलाहबाद में यह माघ मेले के रूप में प्रसिद्द है. बंगाल में इस त्यौहार में स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है . गंगा सागर मेले से हम परिचित हैं ही यह भी मान्यता है कि इसी दिन गंगाजी भागीरथ के पीछे पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जा मिली थीं.गंगा सागर में लाखों श्रद्धालु इकट्ठे होते हैं. यह यात्रा पहले बहुत कष्टकारी होती थी और ऐसा कहा जाता है "सारे तीरथ बार बार गंगा सागर एक बार".
विविध प्रांत
विविध है स्वरूप
विविध नाम |
  
शायद ही कोई दिन बीतता हो, जब किसी पंथ, सम्प्रदाय या क्षेत्र में उत्सव न हो। उत्सव न हों, तो जीने की इच्छा-आकांक्षा ही समाप्त हो जाये। अपने चारों ओर बिखरे संकटों, अव्यवस्थाओं और निराशाओं के बीच उत्सव हमें हंसाकर जीवन में फुलझडि़यां छोड़ देता है। ऐसा ही एक पर्व है मकर संक्रांति, जो केवल उल्लास ही नहीं, परिवर्तन का संदेश भी देता है। क्रांति की चर्चा समाज में बहुत होती है। युवक से लेकर वृद्ध तक, पुरुष से लेकर महिला तक, सब क्रांति करने को तत्पर दिखायी देते हैं; पर बिना इनका सही अर्थ समझे वे भ्रांति में फंस जाते हैं। क्रांति का अर्थ है परिवर्तन। जब किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के जीवन में कोई मूलभूत परिवर्तन होता है, तो उसे क्रांति कहते हैं।
स्वयं उनके घर जाते है. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं.मकर-संक्रांति से प्रकृति भी करवट बदलती है. इस दिन लोग पतंग भी उड़ाते हैं. उन्मुक्त आकाश में उड़ती पतंगें देखकर स्वतंत्रता का अहसास होता है.
लेकिन विशेष तौर पर देखा जाए तो मकर संक्रांति पर्व को तब मनाया जाता है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते है तब संक्रांति मनाई जाती है। शिवपुरी में भी मकर संक्रांति के अवसर पर प्रतिवर्ष मेले का आयोजन होता है। स्थानीय बाणगंगा कुण्ड में किए गए स्नान को भी संक्रांति के दिन विशेष फलदायी माना गया है। सुबह से ही शिवपुरी के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों का आना शुरू हुआ हुआ और कुण्ड में स्नान के बाद पूजन विधि संपन्न कराने के साथ-तिल चढ़ाई गई। इस दिन का दान की परंपरा भी विशेष रूप से मानी जाती है तो दान-पुण्य का क्रम भी लगातार चलता रहा।
त्यों-त्यों पक्के महाल के घरों की धड़कने तेज होती जातीं। बच्चे पतंग उड़ाने की चिंता में तो माता-पिता बच्चों की चिंता में दिन-दिन घुलते रहते। कमरे में लेटो तो यूँ लगता कि हम एक ऐसे ढोल में बंद हैं जिसे कई एक साथ पीट रहे हैं। अकुलाकर छत पर चढ़ो तो बच्चों की पतंग बाजी देखकर सांसें जहाँ की तहाँ थम सी जातीं। तरह-तरह की आवाजें सुनाई देतीं....अरे...मर जैबे रे.s..s..गिरल-गिरल..s..s..कटल-कटल.s..s..बड़ी नक हौ..!..आवा, पेंचा लड़ावा.....ढील दे रे.s..ढील दे.s..खींच के.s..भक्काटा हौ...। जिस दिन पिता जी की छुट्टी होती उस दिन आनंद के लिए घर पर पतंग उड़ाना संभव नहीं था। उस दिन वह श्रीकांत या दूसरे दोस्तों के घरों की शरण लेता मगर जब पिताजी नहीं होते आनंद खूब पतंग उड़ाता। हाँ, मकर संक्रांति के दिन सभी को अभय दान प्राप्त होता था। आनंद के घर की छत के ठीक पीछे दूसरे घर की ऊँची छत थी। जब कोई पतंग कट कर आती तो वहीं रह जाती। उस पतंग को लूटने के चक्कर में आनंद बंदर की तरह उस छत पर चढ़ता। जरा सा पैर फिसला नहीं कि तीन मंजिल नीचे गली में 
चाहे आपके जीवन में कुछ भी क्यूँ न घटित हो जाये। इसलिए मेरा ऐसा मनना है कि ज़िंदगी और वक्त एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं। जीवन में हमेशा आने वाला पल जाने वाला होता है क्यूँकि वक्त किसी के लिए नहीं ठहरता जैसे हवा उसका भी कोई आशियाँना नहीं होता। खैर बात जब ज़िंदगी को हो और उसमें यादों का जिक्र ना हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। यादें जो सभी के पास होती है। कुछ खट्टी ,तो कभी कुछ मीठी भी, जो अक्सर समय-समय पर आकर हमारे मन की कुलबुलाहटों का कारण बन जाती है। कुछ अच्छा जो कभी आतित में हुआ हो, अक्सर वैसा ही कुछ हम वर्तमान में भी चाह ने लगते है और उस चाहत को पाने के लिए मन कुलबुलाने सा लगता है कभी-कभी, मेरे साथ तो अक्सर ऐसा होता है और मुझे यकीन है आपके साथ भी ज़रूर होता होगा।

इस दिन की आने वाली धार्मिक कृतियों के कारण जीवों में प्रेमभाव बढ़ने में और नकारात्मक दृष्टिकोण से सकारात्मक दृष्टिकोण की ओर जाने में सहायता मिलती है। इस निमित्त पाठकों के लिए ग्रंथों से प्राप्त मकर संक्रांति की जानकारी दे रहे हैं।
आज तो मकर संक्रांति है .चलो अब से दिन थोड़े बड़े होंगे ओर इस हाड़ कपाऊ सर्दी से थोड़ी राहत मिलेगी.सबसे पहला ख्याल तो यही आया.सन्डे की छुट्टी ढेर सारा काम ओर त्यौहार ओर सबसे बड़ी बात काम वाली बाई की छुट्टी.सब काम से निबटते दोपहर हो गयी. वैसे तो आज भी ठण्ड काफी थी तो सोचा चलो थोड़ी देर छत पर धूप सेक ली जाये. रेडियो विविध भारती पर बड़े अच्छे पुराने गाने आ रहे थे उन्हें छोड़ कर छत पर जाने का मन नहीं हुआ ,तो झट मोबाइल में रेडियो लगाया ओर गुनगुनी धूप में ऊपर पहुँच गए.
अक्सर सुबह ही उठ रही हूँ वैसे...इस समय लिखना, पढना अच्छा लगता है. सुबह के इस पहर थोड़ा शहर का शोर रहता है पर आज जाने क्यूँ सारी आवाजें वही हैं जो देवघर में होती थीं...बहुत सा पंछियों की चहचहाहट...कव्वे, कबूतर शायद गौरईया भी...पड़ोसियों के घर से आते आवाजों के टूटे टुकड़े...अचरज इस बात पर हो रहा है कि कव्वा भी आज कर्कश बोली नहीं बोल रहा...या कि शायद मेरा ही मन बहुत अच्छा है.बहुत साल पहले का एक छूटा हुआ दिन याद आ रहा है...मकर संक्रांति और मेरे भाई का जन्मदिन एक ही दिन होता है १४ जनवरी को. आजकल तो मकर संक्रांति भी कई बार सुनते हैं कि १५ को होने वाला है 
धरा का तन गीला- गीला l
पतंगों की उन्मुक्त उड़ान
तरु-पल्लव में है मुस्कान l
मकर-संक्रांति को भारत के हर प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. और वहाँ के वासी अलग-अलग तरीके से इस त्योहार को मनाते हैं. पंजाब में इसे लोहड़ी बोलते हैं जो मकर-संक्राति के एक दिन पहले की शाम को मनायी जाती है. और उत्तरप्रदेश में, जहाँ से मैं आती हूँ, इसे मकर-संक्रांति ही बोलते हैं. लोग सुबह तड़के स्नान करते हैं ठंडे पानी में. और इस दिन को खिचड़ी दिवस के रूप में मनाते हैं. यानि घर की औरतें एक थाली में उड़द की काली दाल, नये चावल, नमक, मिर्च, गुड़, घी व कुछ रूपया-पैसा रखती हैं और घर के आदमी लोग पुन्य प्राप्त करने हेतु उसे हाथ से छूते हैं, फिर उसे ब्राह्मणों को देते हैं.
सूरज ने मकर राशि में प्रवेश कर
मकर संक्रांति के आने का दिया संदेश
ईंटों के जंगल में आज बहुत याद आया अपना देश.
गन्ने के रस के उबाल से फैलती हर तरफ
सोंधी सोंधी वो गुड़ की महँक
कुटे जाते हुए तिलों का संगीत
साथ देते बेसुरे कण्ठों का सुरीला गीत.
गंगा स्नान और खिचड़ी का स्वाद,
रंगीन पतंगों से भरा आकाश
और जोश भरी “वो काटा” की गूँज
सर्दियों को अलविदा कहने की धूम.

आप सभी को आपके अपने रविकिशन शुक्ल का प्रणाम . अभी अभी पटना से लौटा हूँ और आपसे रु ब रु हो रहा हूँ . मैं कल रिलीज़ हुई अपनी फिल्म चालीस चौरासी के प्रोमोशन के लिए नसीर साहब, अतुल और अपने निर्देशक ह्रदय शेट्टी के साथ वहाँ गया था. इस बारे में मैं आपसे थोड़ी देर बाद चर्चा करूँगा , सबसे पहले आप सभी को मकर संक्रांति की ढेरो बधाई. कल मकर संक्रांति का त्यौहार है . आज ही से त्योहारों का सिलसिला शुरू हो रहा है. आप लोगों को तो पता ही है की १४ दिसम्बर से १४ जनवरी का समय खरमास के नाम से जाना जाता है और अपने यू पी बिहार में इस दौरान किसी भी अच्छे काम को नहीं किया जाता है . मकर संक्रान्ति से अच्छे दिनों की शुरुआत होती है . मुंबई में तिल गूळ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला कहकर हम एक दुसरे को इस त्योहार की बधाई देते हैं .
और बचपन में जम्मू के लोहड़ी समारोहों में सुना एक गीत, जैसा, जितना याद रहा ...

हुल्ले नी माइ हुल्ले
दो बेरी पत्ता झुल्ले
दो झुल्ल पयीं खजूर्राँ
खजूराँ सुट्ट्या मेवा
एस मुंडे कर मगेवा
मुंडे दी वोटी निक्कदी
ओ खान्दी चूरी कुटदी
कुट कुट भरया थाल
वोटी बावे ननदना नाल
सपने के घर सजाता /
रेशम का कोई कीड़ा /
सो रहा था लाक्षागृह में /
भीड़ में खडा अकेला /
ऊघता एक नीम पुराना /
पिछले मौसम की कहानी ने /
शायद छुआ उसका बदन /
इतने दिनों की शीतनिद्रा से /
आज सहसा जागा शहर /
खिली-खिली पीली धूप में /
डुबकियां ले रहा आसमान /
स्थान था गुलाबी नगर जयपुर...और तारीख थी 14 जनवरी, 1991..
वे व्यंग्य चाहते थे ...पर वह फिर कभी, अभी तो उनके आग्रह का सम्मान कर रहा हूँ .....
शहर
छतों पर है
और पतंगें
आसमान में.
कामनाओं के सूर्य
व्याकुल हो उठे हैं ....संक्रांति को ...
नाना रूप-रंग की पतंगों पर बैठ
उड़ चले हैं.
संक्रांति को व्याकुल
मन-मकर की अभिलाषा है
कि बंध जाएँ
आकाश की सारी पतंगें
उसी की डोर से...
और तोड़ डाले वह
सारी सीमाएं ...सारे बंधन ...
उठ जाए आकाश में
ऊंचा....
बहुत ऊंचा .....
सबसे ऊंचा.........

साठ के दशक में जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब हमारी हिन्दी की पुस्तक में थी वह कविता। आज मुझे उसकी पहली दो पंक्तियाँ ही याद हैं। शायद यह सामान्य-सी कविता ही रही होगी। पर आज मन चाहता है पूरी कविता पढ़ने को। जहां तक मुझे याद है, यह विख्यात छायावादी कवि श्री सुमित्रानंदन पंत की रचना थी:
"जन-पर्व मकर-संक्रांति आज।
उमड़ा नहान को जन-समाज। ..."
आप में से किसी को यह कविता मिले, तो मुझे अवश्य उपलब्ध करवाएँ।
साथ ही, मैं यह महसूस कर रहा हूँ कि हमारा अपना साहित्य इंटरनेट पर आसानी से अब तक भी हम उपलब्ध नहीं करवा सके हैं। हमें इस विषय में अभी बहुत कुछ करना है। आपका क्या विचार है?
मौसम ने हंसकर सुनी, वासंतिक पदचाप ।।
आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं.......

14 टिप्पणियाँ:

मकर सक्रांति ....आपकी पोस्ट्स और संगीता पूरी जी द्वारा सजायी गयी वार्ता ....अद्भुत हो गया सब ......चलो पढना .! चलिए पढना शुरू करते हैं .....!

आज तो आपने कई दिनों की कसर पूरी कर दी। आपको भी संक्रांति की ढेर सारी शुभकामनाएं।

वाह संगीता जी बहुत - बहुत सुन्दर सजाई है आपने वार्ता... संक्रांति के सारे रंग दिखाई दे रहे हैं... आपको भी संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं...

वाह!! बहुत अच्छी वार्ता सजाई है आपने...आपको भी मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ!
हाइगा को स्थान देने के लिए आभार|

मकर संक्रांति पर्व पर एकसाथ इनमे आलेख देखकर अच्छा लगा, आभार!

वाह, क्या कहने.
सच में आज हुई मकर संक्रांति

आपको भी मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ|

सुन्दर वार्ता सजाई है ...
मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ

मकर संक्रांति पर एक बहुत ही बढ़िया जानकारी पूर्ण आलेख लिखने के लिए एवं मेरी पोस्ट को यहाँ स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार ....

bahut khub,,, kafi jankari aapke lekh se mili, thanks sangita ji..

बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

makar sankranti ke bare me vividh rochak jankari mili..abhar.

bahut khoobsurat andaz me aapne makar sankrantri par likha hai..
deron badhai...

पतंग की डोर न टूटे
अपनों का साथ न छूटे//
////उत्तरायन/मकर-सक्रंत्री/मगही-संक्रात/पोंगल/भोगली बिहू /शिशुर सेंक्रात/मोहा-संग्क्रण
की हार्दिक शुभकामनाएं ///

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